श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 41: हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोक वाटिका)- का विध्वंस  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.41.6 
न ह्येक: साधको हेतु: स्वल्पस्यापीह कर्मण:।
यो ह्यर्थं बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'छोटे से छोटे कार्य की सिद्धि के लिए भी केवल एक ही साधन नहीं होता। केवल वही व्यक्ति उस कार्य या उद्देश्य को अनेक तरीकों से सिद्ध करने की कला जानता है, जो उस कार्य को सिद्ध करने में समर्थ हो सकता है।'
 
‘There is not just one means for the accomplishment of even the smallest of tasks. Only a person who knows the art of accomplishing a task or purpose in many ways can be capable of accomplishing the task.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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