श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 41: हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोक वाटिका)- का विध्वंस  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.41.4 
न चास्य कार्यस्य पराक्रमादृते
विनिश्चय: कश्चिदिहोपपद्यते।
हतप्रवीराश्च रणे तु राक्षसा:
कथंचिदीयुर्यदिहाद्य मार्दवम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
इस कार्य की सिद्धि के लिए वीरता के अतिरिक्त अन्य किसी साधन का प्रयोग करना उचित नहीं है। यदि राक्षसों के प्रधान योद्धा युद्ध में मारे जाएँ, तो ये लोग किसी प्रकार क्षमाशील हो सकते हैं।॥4॥
 
For the accomplishment of this task, it is not appropriate to use any other means except valour. If the chief warriors of the demons are killed in the war, then these people may somehow become lenient.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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