श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 41: हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोक वाटिका)- का विध्वंस  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.41.3 
न साम रक्ष:सु गुणाय कल्पते
न दानमर्थोपचितेषु युज्यते।
न भेदसाध्या बलदर्पिता जना:
पराक्रमस्त्वेष ममेह रोचते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
राक्षसों के विरुद्ध युक्ति करने से कोई लाभ नहीं है। उनके पास बहुत धन है, अतः उन्हें दान देने से कोई लाभ नहीं है। इसके अतिरिक्त, उन्हें अपने बल का सदैव अभिमान रहता है, अतः युक्ति से भी उन्हें वश में नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में, यहाँ अपना पराक्रम दिखाना मेरे लिए उचित प्रतीत होता है॥3॥
 
‘There is no benefit in using tactics against demons. They have a lot of wealth, so there is no use in giving them donations. Apart from this, they are always proud of their strength, so they cannot be controlled even by using tactics. In such a situation, it seems appropriate for me to show my valour here.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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