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श्लोक 5.39.52  |
रुद मा देवि शोकेन मा भूत् ते मनसो भयम्।
शचीव भर्त्रा शक्रेण सङ्गमेष्यसि शोभने॥ ५२॥ |
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| अनुवाद |
| 'देवी! शोक से मत रोओ। तुम्हारे मन का भय दूर हो। सुन्दरी! जिस प्रकार शची देवराज इन्द्र से मिलती है, उसी प्रकार तुम अपने पति से मिलोगी। 52। |
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| ‘Devi! Do not cry in grief. May the fear in your mind be dispelled. Beautiful! Just as Sachi meets Devraj Indra, in the same way you will meet your husband. 52. |
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