श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 39: समद्र-तरण के विषय में शङ्कित हुई सीता को वानरों का पराक्रम बताकर हनुमान जी का आश्वासन देना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  5.39.48 
तमरिघ्नं कृतात्मानं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम्।
लक्ष्मणं च धनुष्पाणिं लङ्काद्वारमुपागतम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
देवी! आप शीघ्र ही देखेंगे कि शुद्ध हृदय वाले श्री रघुनाथजी और शत्रुओं का नाश करने वाले लक्ष्मणजी हाथों में धनुष लेकर लंका के द्वार पर आ पहुँचे हैं।
 
Devi! You will soon see that the pure-hearted Sri Raghunatha and Lakshmana, the destroyer of enemies, have arrived at the gates of Lanka with bows in their hands.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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