श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 39: समद्र-तरण के विषय में शङ्कित हुई सीता को वानरों का पराक्रम बताकर हनुमान जी का आश्वासन देना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.39.44 
तदाश्वसिहि भद्रं ते भव त्वं कालकाङ्क्षिणी।
नचिराद् द्रक्ष्यसे रामं प्रज्वलन्तमिवानलम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
अतः धैर्य रखो। तुम्हारा कल्याण हो। उचित समय की प्रतीक्षा करो। प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी श्री रघुनाथजी शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रकट होंगे॥ 44॥
 
‘Therefore be patient. May you be blessed. Wait for the right time. Sri Raghunathji, who is as radiant as a blazing fire, will soon appear before you.॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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