श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 39: समद्र-तरण के विषय में शङ्कित हुई सीता को वानरों का पराक्रम बताकर हनुमान जी का आश्वासन देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.39.37 
असकृत् तैर्महोत्साहै: ससागरधराधरा।
प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभि:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने बड़े उत्साह से भरकर वायु (आकाश) के मार्ग से होकर समुद्र और पर्वतों सहित इस पृथ्वी की अनेक बार परिक्रमा की है॥ 37॥
 
Filled with great enthusiasm, he has circumambulated this earth including the oceans and mountains several times, following the path of the air (sky).॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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