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श्लोक 5.39.24-25  |
अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रत:।
सुमहांस्त्वत्सहायेषु हर्यृक्षेषु हरीश्वर॥ २४॥
कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम्।
तानि हर्यृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| हे वीर वानरराज! मुझे आपके साथी रीछ-वानरों के विषय में अभी भी यह महान् संदेह है कि वे रीछ-वानरों की सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्री राम और लक्ष्मण इस दुर्गम समुद्र को किस प्रकार पार करेंगे॥ 24-25॥ |
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| O brave monkey lord! I still have this great doubt about your fellow bears and monkeys that how will those armies of bears and monkeys and those two princes Shri Ram and Lakshman cross this difficult ocean.॥ 24-25॥ |
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