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श्लोक 5.38.9  |
इच्छामि त्वां समानेतुमद्यैव रघुनन्दिना।
गुरुस्नेहेन भक्त्या च नान्यथा तदुदाहृतम्॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| मैं आज ही आपको श्री रघुनाथजी से मिलवाना चाहता था, अतः मैंने यह बात केवल अपने पूज्य गुरु श्री रामजी के प्रति प्रेम और आपके प्रति भक्ति के कारण कही, अन्य किसी उद्देश्य से नहीं॥9॥ |
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| ‘I wanted to introduce you to Shri Raghunath today itself. Hence, I said this only because of my love for my revered Guru Shri Ram and my devotion towards you, and not for any other purpose.॥ 9॥ |
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