श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 38: सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  5.38.65 
रावणेनोपरुद्धां मां निकृत्या पापकर्मणा।
त्रातुमर्हसि वीर त्वं पातालादिव कौशिकीम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
हे वीर! पापी रावण ने मुझे कैद कर लिया है। इसलिए राक्षसियाँ छलपूर्वक मुझे कष्ट दे रही हैं। जैसे भगवान विष्णु ने इंद्र की लक्ष्मी को पाताल से बचाया था, वैसे ही आप मुझे भी यहाँ से छुड़ाएँ॥ 65॥
 
Valiant! The sinful Ravana has imprisoned me. Therefore, the demonesses are treacherously tormenting me. Just as Lord Vishnu rescued Indra's Laxmi from the netherworld, please rescue me from here in the same manner.'॥ 65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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