श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 38: सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  5.38.46 
ममैव दुष्कृतं किंचिन्महदस्ति न संशय:।
समर्थावपि तौ यन्मां नावेक्षेते परंतपौ॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
निःसंदेह मैंने कोई महान पाप किया है, जिसके कारण वे दोनों वीर शत्रु मुझे बचाने में समर्थ होते हुए भी मुझ पर कृपादृष्टि नहीं कर रहे हैं।'
 
Undoubtedly I have committed some great sin, due to which those two brave enemies are not looking kindly upon me even though they are capable of saving me.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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