श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 38: सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.38.3 
स्त्रीत्वान्न त्वं समर्थासि सागरं व्यतिवर्तितुम्।
मामधिष्ठाय विस्तीर्णं शतयोजनमायतम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम दुर्बल होने के कारण मेरी पीठ पर बैठकर सौ योजन चौड़े समुद्र को पार करने में समर्थ नहीं हो॥3॥
 
There is no doubt that because you are weak, you are not capable of sitting on my back and crossing the sea which is one hundred yojanas wide.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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