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श्लोक 5.38.3  |
स्त्रीत्वान्न त्वं समर्थासि सागरं व्यतिवर्तितुम्।
मामधिष्ठाय विस्तीर्णं शतयोजनमायतम्॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम दुर्बल होने के कारण मेरी पीठ पर बैठकर सौ योजन चौड़े समुद्र को पार करने में समर्थ नहीं हो॥3॥ |
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| There is no doubt that because you are weak, you are not capable of sitting on my back and crossing the sea which is one hundred yojanas wide.॥ 3॥ |
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