श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 37: सीता का हनुमान जी से श्रीराम को शीघ्र बुलाने का आग्रह, हनुमान जी का सीता से अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीता का अस्वीकार करना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  5.37.58 
अथवाऽऽदाय रक्षांसि न्यसेयु: संवृते हि माम्।
यत्र ते नाभिजानीयुर्हरयो नापि राघव:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
अथवा यह भी सम्भव है कि राक्षस मुझे ले जाकर किसी गुप्त स्थान पर रख दें, जहाँ न तो वानर मुझे पा सकें और न ही श्री रघुनाथजी।
 
Or it is also possible that the demons may take me away and keep me in some secret place, where neither the monkeys nor Shri Raghunathji can find me.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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