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श्लोक 5.37.55  |
मां वा हरेयुस्त्वद्धस्ताद् विशसेयुरथापि वा।
अनवस्थौ हि दृश्येते युद्धे जयपराजयौ॥ ५५॥ |
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| अनुवाद |
| अथवा यह भी सम्भव है कि वे राक्षस मुझे तुम्हारे हाथ से छीन लें अथवा मार डालें; क्योंकि युद्ध में जय-पराजय तो सदैव अनिश्चित रहती है ॥55॥ |
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| ‘Or it is also possible that those demons snatch me from your hands or kill me; because in war victory and defeat are always uncertain. ॥ 55॥ |
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