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श्लोक 5.37.40  |
तदवस्थाप्यतां बुद्धिरलं देवि विकाङ्क्षया।
विशोकं कुरु वैदेहि राघवं सहलक्ष्मणम्॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| अतः तुम मेरे साथ चलने का निश्चय करो। तुम्हारी आशंका व्यर्थ है। देवि! विदेहनन्दिनी! मेरे साथ चलो और लक्ष्मण सहित श्री रघुनाथजी का शोक दूर करो।॥40॥ |
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| ‘Therefore, you must decide to come with me. Your apprehension is futile. Devi! Videhanandini! Come with me and remove the grief of Shri Raghunathji along with Lakshmana.'॥ 40॥ |
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