श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 37: सीता का हनुमान जी से श्रीराम को शीघ्र बुलाने का आग्रह, हनुमान जी का सीता से अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीता का अस्वीकार करना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.37.23 
अहं प्रस्रवणस्थाय राघवायाद्य मैथिलि।
प्रापयिष्यामि शक्राय हव्यं हुतमिवानल:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
मिथिलेशकुमारी! प्रस्रवणगिरि पर रघुनाथजी रहते हैं। मैं आज ही तुम्हें उनके पास ले चलता हूँ। जैसे अग्निदेव हवन की आहुति को इन्द्र के पास ले जाते हैं॥ 23॥
 
‘Mithilesh Kumari! Raghunathji lives on Prasravangiri. I will take you to him today itself. Just like Agnidev takes the offerings made in havan to Indra.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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