श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 36: हनुमान जी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान् का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.36.47 
सा रामसंकीर्तनवीतशोका
रामस्य शोकेन समानशोका।
शरन्मुखेनाम्बुदशेषचन्द्रा
निशेव वैदेहसुता बभूव॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी की चर्चा से सीताका का अपना शोक तो दूर हो गया; परन्तु श्री राम का शोक सुनकर वह पुनः उन्हीं के समान शोक में डूब गई। उस समय विदेहनन्दिनी सीता हर्ष और शोक से परिपूर्ण ऐसी प्रतीत हो रही थीं, जैसे शरद ऋतु आने पर मेघ और चन्द्रमा (अंधकार और प्रकाश) से युक्त रात्रि होती है।
 
Sitaka's own grief went away by the discussion of Shri Ramchandraji; But after hearing about Shri Ram's grief, she again got immersed in the same grief as him. At that time, Videhanandini Sita appeared to be full of joy and sorrow, like a night full of clouds and moon (dark and light) when the autumn season comes.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट‍‍्त्रिंश: सर्ग:॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas