श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 36: हनुमान जी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान् का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.36.40 
क्षिप्रं द्रक्ष्यसि वैदेहि रामं प्रस्रवणे गिरौ।
शतक्रतुमिवासीनं नागपृष्ठस्य मूर्धनि॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
विदेहनन्दिनी! तुम शीघ्र ही भगवान राम को प्रस्रवण गिरि के शिखर पर ऐरावत की पीठ पर बैठे हुए देखोगे, जैसे इंद्रदेव।
 
Videhanandini! You will soon see Lord Rama seated on the top of Prasravan Giri like Lord Indra, sitting on the back of Airavat.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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