श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 36: हनुमान जी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान् का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.36.4 
गृहीत्वा प्रेक्षमाणा सा भर्तु: करविभूषितम्।
भर्तारमिव सम्प्राप्तं जानकी मुदिताभवत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सीता ने अपने पति के हाथ में पहनी हुई अंगूठी ली और उसे ध्यान से देखने लगीं। उस समय जानकी को ऐसी प्रसन्नता हुई, मानो उन्हें साक्षात् पति मिल गया हो।
 
Sita took the ring that adorned her husband's hand and started looking at it carefully. Janaki felt so happy at that time, as if she had found her husband himself.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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