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श्लोक 5.36.35  |
विष्टम्भयित्वा बाणौघैरक्षोभ्यं वरुणालयम्।
करिष्यति पुरीं लङ्कां काकुत्स्थ: शान्तराक्षसाम्॥ ३५॥ |
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| अनुवाद |
| ककुत्स्थकुलभूषण श्री राम अपने बाणों से अक्षोभ्य सागर को स्तब्ध कर देंगे और उस पर सेतु बनाकर लंकापुरी पहुँचकर उसे राक्षसों से निर्जन कर देंगे॥35॥ |
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| Kakutsthakulbhushan Shri Ram will stun the Akshobhya ocean with his arrows and will reach Lankapuri by building a bridge over it and will make it deserted from the demons. 35॥ |
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