|
| |
| |
श्लोक 5.36.20  |
कच्चिन्न विगतस्नेहो विवासान्मयि राघव:।
कच्चिन्मां व्यसनादस्मान्मोक्षयिष्यति राघव:॥ २०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| दुर्भाग्यवश मैं उनसे वियोग में पड़ गया हूँ। क्या इसी कारण श्री रघुनाथजी का मुझ पर स्नेह समाप्त हो गया है? क्या वे मुझे इस संकट से कभी छुड़ाएँगे?॥ 20॥ |
| |
| ‘Unfortunately I have become separated from him. Has Shri Raghunathji lost his affection for me because of this? Will he ever rescue me from this crisis?॥ 20॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|