श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 36: हनुमान जी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान् का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.36.20 
कच्चिन्न विगतस्नेहो विवासान्मयि राघव:।
कच्चिन्मां व्यसनादस्मान्मोक्षयिष्यति राघव:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
दुर्भाग्यवश मैं उनसे वियोग में पड़ गया हूँ। क्या इसी कारण श्री रघुनाथजी का मुझ पर स्नेह समाप्त हो गया है? क्या वे मुझे इस संकट से कभी छुड़ाएँगे?॥ 20॥
 
‘Unfortunately I have become separated from him. Has Shri Raghunathji lost his affection for me because of this? Will he ever rescue me from this crisis?॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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