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निवेदितौ च तत्त्वेन सुग्रीवाय महात्मने॥ ३२॥
तयोरन्योन्यसम्भाषाद् भृशं प्रीतिरजायत।
अनुवाद
वहाँ मैंने महात्मा सुग्रीव को इन दोनों भाइयों का सच्चा परिचय दिया। उसके बाद श्री राम और सुग्रीव ने आपस में बातचीत की, जिससे उनमें बड़ा प्रेम हो गया।
There I gave the true introduction of these two brothers to Mahatma Sugriva. After that Shri Ram and Sugriva talked to each other, due to which there was great love between them.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥