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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  5.34.25-26 
इत्येवं बहुधा सीता सम्प्रधार्य बलाबलम्।
रक्षसां कामरूपत्वान्मेने तं राक्षसाधिपम्॥ २५॥
एतां बुद्धिं तदा कृत्वा सीता सा तनुमध्यमा।
न प्रतिव्याजहाराथ वानरं जनकात्मजा॥ २६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार राक्षसों का बल और वानरों की दुर्बलता अनेक प्रकार से जानकर सीता ने उसे राक्षसराज रावण ही समझा; क्योंकि राक्षसों में इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति होती है। ऐसा विचारकर पतली कमर वाली जनकपुत्री सीता ने वानर-सवार हनुमान से फिर कुछ नहीं कहा। 25-26।
 
In this way, Sita, having determined the strength of the demons and the weakness of the monkeys in many ways, considered him to be the demon king Ravana; because demons have the power to assume any form they wish. Thinking this, Janak's daughter Sita, who had a thin waist, did not say anything to the monkey-rider Hanuman again. 25-26.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)