श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.34.16 
उपवासकृशां दीनां कामरूप निशाचर।
संतापयसि मां भूय: संतापं तन्न शोभनम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे निशाचर प्राणियों, जो इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करते हैं! मैं व्रत के कारण दुबली हो गई हूँ और हृदय में दुःखी हूँ। फिर भी तुम मुझे पुनः कष्ट दे रहे हो, जो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है॥16॥
 
You nocturnal creatures who assume any form at will! I have become thin due to fasting and am saddened in my heart. Despite this, you are again tormenting me, which is not good for you.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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