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ramayan 5.34.10: यह विचार मन में आते ही वह मन ही मन कहने लगी, 'हाय! मुझे धिक्कार है कि मैंने अपने मन की बात उससे कह दी। यह वही रावण है, जो दूसरा रूप धारण करके आया है।'॥10॥   |   ramayan सर्ग 5.34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.34.10 
अहो धिग् धिक्कृतमिदं कथितं हि यदस्य मे।
रूपान्तरमुपागम्य स एवायं हि रावण:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
यह विचार मन में आते ही वह मन ही मन कहने लगी, 'हाय! मुझे धिक्कार है कि मैंने अपने मन की बात उससे कह दी। यह वही रावण है, जो दूसरा रूप धारण करके आया है।'॥10॥
 
As soon as this thought came to her mind, she started saying to herself, 'Oh! Shame on me for telling him what was in my mind. This is the same Ravana who has come in a different form.'॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)