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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
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सर्ग 33: सीताजी का हनुमान जी को अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरण का वृत्तान्त बताना
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श्लोक 27
श्लोक
5.33.27
साहं तस्याग्रतस्तूर्णं प्रस्थिता वनचारिणी।
नहि मे तेन हीनाया वास: स्वर्गेऽपि रोचते॥ २७॥
अनुवाद
परन्तु मैं तुरन्त ही उसके आगे-आगे वन की ओर चला गया; क्योंकि उसके बिना स्वर्ग में रहना मुझे अच्छा नहीं लगता॥27॥
‘But I immediately went ahead of him towards the forest; because I do not like to stay in heaven without him.॥ 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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