श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 33: सीताजी का हनुमान जी को अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.33.24 
स पितुर्वचनं श्रीमानभिषेकात् परं प्रियम्।
मनसा पूर्वमासाद्य वाचा प्रतिगृहीतवान्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'श्री राम को अपने पिता के वचन अपने राज्याभिषेक से भी अधिक प्रिय थे। इसीलिए उन्होंने पहले उन वचनों को मन में स्वीकार किया और फिर वचनों से भी उन्हें स्वीकार किया।'
 
‘Shri Ram loved his father's words more than his coronation. That is why he first accepted those words in his mind and then accepted them with his words as well.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)