श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 33: सीताजी का हनुमान जी को अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.33.17 
समा द्वादश तत्राहं राघवस्य निवेशने।
भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अयोध्या में श्री रघुनाथजी के अन्तःकक्ष में बारह वर्षों तक मैंने सब प्रकार के मानव सुखों का उपभोग किया और मेरी समस्त इच्छाएँ सदैव पूरी होती रहीं॥ 17॥
 
For twelve years in Ayodhya, in the inner chamber of Sri Raghunathji, I enjoyed all kinds of human pleasures and all my desires were always fulfilled.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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