श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 33: सीताजी का हनुमान जी को अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  5.33.10-11 
रोदनादतिनि:श्वासाद् भूमिसंस्पर्शनादपि।
न त्वां देवीमहं मन्ये राज्ञ: संज्ञावधारणात्॥ १०॥
व्यञ्जनानि हि ते यानि लक्षणानि च लक्षये।
महिषी भूमिपालस्य राजकन्या च मे मता॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'मैं तुम्हें देवी नहीं मानता, क्योंकि तुम रो रही हो, गहरी साँसें ले रही हो और पृथ्वी का स्पर्श कर रही हो। तुम बार-बार किसी राजा का नाम ले रही हो और तुम्हारे लक्षण देखकर ऐसा अनुमान होता है कि तुम किसी राजा की रानी और किसी राजा की पुत्री हो।॥10-11॥
 
‘I do not consider you a goddess because you are crying, taking deep breaths and touching the earth. You are repeatedly taking the name of a king and looking at your signs and symptoms, it can be assumed that you are the queen of a king and the daughter of a king.॥ 10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)