| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 5: सुन्दर काण्ड » सर्ग 32: सीताजी का तर्क-वितर्क » श्लोक 3 |
|
| | | | श्लोक 5.32.3  | साथ दृष्ट्वा हरिश्रेष्ठं विनीतवदवस्थितम्।
मैथिली चिन्तयामास विस्मयं परमं गता॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | वानरश्रेष्ठ हनुमान जी को विनीत भाव से बैठे देखकर मिथिलेशकुमारी को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे मन ही मन सोचने लगीं -॥3॥ | | | | Mithilesh Kumari was very surprised to see Hanuman Ji, the best of the monkeys, sitting humbly. She started thinking to herself -॥ 3॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|