श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 32: सीताजी का तर्क-वितर्क  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.32.14 
नमोऽस्तु वाचस्पतये सवज्रिणे
स्वयम्भुवे चैव हुताशनाय।
अनेन चोक्तं यदिदं ममाग्रतो
वनौकसा तच्च तथास्तु नान्यथा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
मैं वाणी के स्वामी बृहस्पति, वज्रधारी इन्द्र, स्वयंभू ब्रह्माजी और वाणी के अधिष्ठाता अग्निदेव को भी नमस्कार करता हूँ। इस वनवासी वानर ने मेरे सम्मुख जो कुछ कहा है, वह सब सत्य हो, उसमें कोई विपरीत बात न हो। 14॥
 
I also salute Brihaspati, the lord of speech, Indra who wields the thunderbolt, Brahmaji who is self-empowered and Agni, the presiding deity of speech. Whatever this forest-dwelling monkey has said in front of me, everything should be true, there should not be anything contrary in it. 14॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वात्रिंश: सर्ग:॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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