श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 32: सीताजी का तर्क-वितर्क  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.32.12 
अहं हि तस्याद्य मनोभवेन
सम्पीडिता तद‍्गतसर्वभावा।
विचिन्तयन्ती सततं तमेव
तथैव पश्यामि तथा शृणोमि॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मेरा हृदय सदैव श्री रघुनाथजी में ही लगा रहता है; इसलिए श्री रामजी के दर्शन की इच्छा से व्याकुल होकर मैं सदैव उनका ही चिंतन करता हूँ, उनका दर्शन करता हूँ और उनकी कथाएँ सुनता हूँ॥ 12॥
 
‘My heart is always devoted to Sri Raghunatha; therefore, being tormented by the desire to see Sri Rama, I always think of Him, see Him and listen to His stories.॥ 12॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas