श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 32: सीताजी का तर्क-वितर्क  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.32.11 
रामेति रामेति सदैव बुद्धॺा
विचिन्त्य वाचा ब्रुवती तमेव।
तस्यानुरूपं च कथां तदर्था-
मेवं प्रपश्यामि तथा शृणोमि॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मैं मन में सदैव ‘राम! राम!’ का चिंतन करता हूँ और वाणी से भी राम-नाम का उच्चारण करता रहता हूँ; अतः उसी विचार के अनुसार मैं उसी अर्थ से इस कथा को देख और सुन रहा हूँ॥ 11॥
 
I always think of 'Rama! Rama!' in my mind and also keep on uttering the name of Rama through my words; hence in accordance with that thought, I am watching and listening to this story with the same meaning.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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