श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 32: सीताजी का तर्क-वितर्क  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.32.10 
स्वप्नो हि नायं नहि मेऽस्ति निद्रा
शोकेन दु:खेन च पीडिताया:।
सुखं हि मे नास्ति यतो विहीना
तेनेन्दुपूर्णप्रतिमाननेन॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘परन्तु यह स्वप्न नहीं हो सकता, क्योंकि मैं शोक और शोक से पीड़ित हूँ और मुझे नींद नहीं आ रही है (नींद तो सुखी लोगों को ही आती है)। अब मुझे सुख सहज में नहीं मिल रहा, क्योंकि मैं पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाले श्री रघुनाथजी से विमुख हूँ॥ 10॥
 
‘But this cannot be a dream, because I am suffering from grief and sorrow and I am unable to sleep (sleep is possible only for those who are happy). Happiness is not easily available to me now, as I am separated from Shri Raghunathji whose face is like the full moon.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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