श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 31: हनुमान जी का सीता को सुनाने के लिये श्रीराम-कथा का वर्णन करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.31.7 
रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य स्वजनस्यापि रक्षिता।
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य च परंतप:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं को पीड़ा देने वाले श्री राम उनके सदाचार, उनके बन्धुओं, इस चराचर जगत और धर्म के रक्षक हैं॥ 7॥
 
Sri Rama, who causes torment to his enemies, is the protector of his good conduct, of his relatives, of this living world as well as of Dharma.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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