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श्लोक 5.31.4-5  |
अहिंसारतिरक्षुद्रो घृणी सत्यपराक्रम:।
मुख्यस्येक्ष्वाकुवंशस्य लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मिवर्धन:॥ ४॥
पार्थिवव्यञ्जनैर्युक्त: पृथुश्री: पार्थिवर्षभ:।
पृथिव्यां चतुरन्तायां विश्रुत: सुखद: सुखी॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| 'उनमें अहिंसा धर्म के प्रति बड़ी लगन थी। उनमें क्षुद्रता का लेशमात्र भी नहीं था। वे दयालु, सत्यवादी, वीर थे और महान इक्ष्वाकु वंश को गौरव प्रदान करने वाले थे। वे लक्ष्मीवान राजा राजसी गुणों से युक्त, बलवान सौन्दर्य से युक्त और भूपालों में श्रेष्ठ थे। चारों समुद्रों तक फैले सम्पूर्ण भूमण्डल में उनकी बड़ी कीर्ति थी। वे स्वयं सुखी थे। वे दूसरों को भी सुख देने वाले थे। 4-5॥ |
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| ‘He had great passion for the religion of non-violence. There was no trace of pettiness in them. He was kind, truthful, brave and brought glory to the great Ikshvaku dynasty. That Lakshmivan king was full of royal traits, full of strong beauty and was the best among Bhupals. He had great fame all over the entire globe whose boundaries are the four seas. He himself was happy. He was the one who gave happiness to others also. 4-5॥ |
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