श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 31: हनुमान जी का सीता को सुनाने के लिये श्रीराम-कथा का वर्णन करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.31.3 
राजर्षीणां गुणश्रेष्ठस्तपसा चर्षिभि: सम:।
चक्रवर्तिकुले जात: पुरंदरसमो बले॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'उस महान राजा में राजा के गुण थे। वह तपस्या में ऋषियों के समान था। वह चक्रवर्ती राजाओं के कुल में उत्पन्न हुआ था। वह देवराज इंद्र के समान शक्तिशाली था।
 
‘That great king had the qualities of a king. He was equal to sages in his penance. He was born in the family of Chakravarti kings. He was as powerful as Devraj Indra.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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