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श्लोक 5.31.19  |
सा तिर्यगूर्ध्वं च तथा ह्यधस्ता-
न्निरीक्षमाणा तमचिन्त्यबुद्धिम्।
ददर्श पिंगाधिपतेरमात्यं
वातात्मजं सूर्यमिवोदयस्थम्॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| ऊपर-नीचे और इधर-उधर देखकर उसने अचिन्त्य बुद्धि वाले पवनपुत्र हनुमान् को देखा, जो वानरराज सुग्रीव के मंत्री थे, मानो उगते हुए सूर्य पर बैठे हुए सूर्य हों॥19॥ |
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| Looking up and down and here and there, he saw Hanuman, the son of the wind with inconceivable intelligence, who was the minister of the monkey king Sugriva, like the sun sitting on the rising sun. 19॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकत्रिंश: सर्ग:॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥ |
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