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श्लोक 5.31.14-15h  |
अहं सम्पातिवचनाच्छतयोजनमायतम्॥ १४॥
तस्या हेतोर्विशालाक्ष्या: समुद्रं वेगवान् प्लुत:। |
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| अनुवाद |
| मैं भी उनमें से एक हूँ। सम्पातीक की सलाह पर मैं महानेत्रों वाली विदेहनन्दिनी की खोज में सौ योजन फैले हुए समुद्र को शीघ्रतापूर्वक पार करके यहाँ आया हूँ।॥14 1/2॥ |
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| ‘I am also one of them. On the advice of Sampātik, I have come here quickly crossing the sea which is spread over a hundred yojnas in search of the great-eyed Videhanandini.॥ 14 1/2॥ |
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