श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 31: हनुमान जी का सीता को सुनाने के लिये श्रीराम-कथा का वर्णन करना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  5.31.11-12h 
वञ्चयित्वा वने रामं मृगरूपेण मायया।
स मार्गमाणस्तां देवीं राम: सीतामनिन्दिताम्॥ ११॥
आससाद वने मित्रं सुग्रीवं नाम वानरम्।
 
 
अनुवाद
‘पहले उस राक्षस ने अपनी माया से मृगरूपी मारीच के द्वारा वन में श्री रामजी को छल से वश में किया, फिर स्वयं जानकीजी का हरण कर लिया।’ परम पवित्र सीतादेवी की खोज करते हुए भगवान रामजी मतंग वन में आए और सुग्रीव नामक वानर से मिले तथा उससे मित्रता स्थापित की।॥ 11 1/2॥
 
‘First that demon deceived Shri Rama in the forest through Maricha who had taken the form of a deer by his illusion and then himself abducted Janaki. While searching for the most pious Sitadevi, Lord Rama came to the Matang forest and met a monkey named Sugreev and established friendship with him.॥ 11 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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