श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.30.35 
असत्यानि च युद्धानि संशयो मे न रोचते।
कश्च नि:संशयं कार्यं कुर्यात् प्राज्ञ: ससंशयम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
युद्ध अनिश्चित है (इसमें किस पक्ष की विजय होगी, यह निश्चित नहीं है) और मुझे कोई भी संशययुक्त कार्य प्रिय नहीं है। कौन इतना बुद्धिमान होगा जो संशयरहित होकर संशययुक्त कार्य करना चाहेगा?॥ 35॥
 
‘War is uncertain (it is not certain which side will win in it) and I do not like any work which is full of doubt. Who would be so intelligent as to want to make an action without doubt full of doubt?॥ 35॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas