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श्लोक 5.30.34  |
कामं हन्तुं समर्थोऽस्मि सहस्राण्यपि रक्षसाम्।
न तु शक्ष्याम्यहं प्राप्तुं परं पारं महोदधे:॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| मैं इच्छा होने पर हजारों राक्षसों का वध करने में समर्थ हूँ; परंतु यदि मैं युद्ध में फँस जाऊँ तो समुद्र पार नहीं कर सकूँगा॥ 34॥ |
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| I am capable of killing thousands of demons at will; but if I get caught in a battle I will not be able to cross the ocean.॥ 34॥ |
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