श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.30.34 
कामं हन्तुं समर्थोऽस्मि सहस्राण्यपि रक्षसाम्।
न तु शक्ष्याम्यहं प्राप्तुं परं पारं महोदधे:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
मैं इच्छा होने पर हजारों राक्षसों का वध करने में समर्थ हूँ; परंतु यदि मैं युद्ध में फँस जाऊँ तो समुद्र पार नहीं कर सकूँगा॥ 34॥
 
I am capable of killing thousands of demons at will; but if I get caught in a battle I will not be able to cross the ocean.॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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