श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.30.19 
अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्।
मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता॥ १९॥
 
 
अनुवाद
ऐसी स्थिति में मुझे अवश्य ही अयोध्या के आस-पास के सामान्य लोगों द्वारा बोली जाने वाली अर्थपूर्ण भाषा का प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा मैं इस धर्मपरायण एवं पतिव्रता सीता को उचित आश्वासन नहीं दे पाऊँगा॥19॥
 
In such a situation I must certainly use the meaningful language which is spoken by the common people around Ayodhya, otherwise I will not be able to give proper assurance to this virtuous and faithful Sita.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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