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ramayan 5.3.35: हनुमान जी का यह कथन सुनकर लंका, जो अपनी इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकती थी, पुनः कठोर शब्दों में बोली -   |   ramayan सर्ग 5.3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.3.35 
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लंका सा कामरूपिणी।
भूय एव पुनर्वाक्यं बभाषे परुषाक्षरम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हनुमान जी का यह कथन सुनकर लंका, जो अपनी इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकती थी, पुनः कठोर शब्दों में बोली -
 
Upon hearing this statement of Hanuman ji, Lanka, which could take any form as per its wish, once again spoke in harsh words -
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)