श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 28: विलाप करती हुई सीता का प्राण त्याग के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.28.4 
सुखाद् विहीनं बहुदु:खपूर्ण-
मिदं तु नूनं हृदयं स्थिरं मे।
विदीर्यते यन्न सहस्रधाद्य
वज्राहतं शृंगमिवाचलस्य॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मेरा यह हृदय सुखों से रहित और अनेक प्रकार के दुःखों से युक्त होने पर भी निश्चय ही अत्यन्त बलवान है, इसीलिए यह वज्र से घायल पर्वत शिखर के समान हजारों टुकड़ों में नहीं टूटता॥4॥
 
‘This heart of mine, despite being devoid of happiness and filled with many kinds of sorrows, is certainly very strong. That is why it does not break into thousands of pieces like a mountain peak struck by thunderbolt.॥ 4॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas