श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 28: विलाप करती हुई सीता का प्राण त्याग के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.28.2 
सा राक्षसीमध्यगता च भीरु-
र्वाग्भिर्भृशं रावणतर्जिता च।
कान्तारमध्ये विजने विसृष्टा
बालेव कन्या विललाप सीता॥ २॥
 
 
अनुवाद
राक्षसियों के बीच में बैठी हुई, उनके द्वारा बार-बार कठोर शब्दों से डराए जाने और रावण द्वारा फटकारे जाने पर, स्वभाव से ही डरपोक सीता, निर्जन और बीहड़ वन में अकेली छोड़ी हुई बालिका के समान विलाप करने लगी॥2॥
 
Sitting in the midst of the demonesses, threatened again and again with harsh words by them and rebuked by Ravana, timid Sita, by nature, began to lament like a young girl left alone in a deserted and rugged forest.॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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