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श्लोक 5.28.17  |
शोकाभितप्ता बहुधा विचिन्त्य
सीताथ वेणीग्रथनं गृहीत्वा।
उद्बद्ध्य वेण्युद्ग्रथनेन शीघ्र-
महं गमिष्यामि यमस्य मूलम्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| सीता ने दुःख से अभिभूत होकर बहुत विचार-विमर्श के बाद अपनी चोटी पकड़ी और निश्चय किया कि वह शीघ्र ही अपनी चोटी से फांसी लगाकर यमलोक चली जाएंगी। |
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| Sita, overcome with grief, after much deliberation, held her braid and decided that she would soon hang herself with her braid and go to Yamaloka. |
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