श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 28: विलाप करती हुई सीता का प्राण त्याग के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.28.12 
अनन्यदेवत्वमियं क्षमा च
भूमौ च शय्या नियमश्च धर्मे।
पतिव्रतात्वं विफलं ममेदं
कृतं कृतघ्नेष्विव मानुषाणाम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मेरी अनन्य भक्ति, क्षमा, भूमिशयन, धर्मपालन और पतिभक्ति - ये सब मनुष्यों द्वारा कृतघ्न मनुष्यों पर किए गए उपकार के समान निष्फल हो गए हैं ॥12॥
 
My exclusive worship, forgiveness, land bed, adherence to religious rules and devotion to my husband - all of these have proved fruitless like the favors rendered by humans towards ungrateful people. 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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