श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 27: त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.27.47 
अपि चास्या विशालाक्ष्या न किंचिदुपलक्षये।
विरूपमपि चांगेषु सुसूक्ष्ममपि लक्षणम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
मैं बड़े-बड़े नेत्रों वाली सीता के शरीर में (जिससे यह ज्ञात हो कि वह सदैव दुःखी रहेगी) किंचितमात्र भी हानि का लक्षण नहीं देखता हूँ॥ 47॥
 
‘I do not see even the slightest symptom of harm in the body of Sita with large eyes (which would indicate that she will always be in pain).॥ 47॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd