श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 27: त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.27.44 
यस्या ह्येवंविध: स्वप्नो दु:खिताया: प्रदृश्यते।
सा दु:खैर्बहुभिर्मुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जिस दुःखी स्त्री के विषय में ऐसा स्वप्न देखा जाता है, वह अनेक दुःखों से छूटकर परम प्रिय वस्तु प्राप्त करती है ॥44॥
 
The distressed woman about whom such a dream is seen, gets relief from many sorrows and obtains the most precious thing. ॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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